सियासत के साए में समितियों का खेल!
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज़ हो गई है। सत्ता की बिसात पर मोहरे फिर से सजा दिए गए हैं। क्या यह सिर्फ़ एक औपचारिक प्रक्रिया है, या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक गणित छिपा है?
1 अप्रैल को बिहार विधानसभा की समितियों के पुनर्गठन की घोषणा कर दी गई, जिसमें सबसे ज्यादा पद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खाते में गए, जबकि जनता दल यूनाइटेड (जदयू) तीसरे स्थान पर खिसक गया। क्या यह एक संकेत है कि जदयू की ताकत कम हो रही है, या यह केवल एक रणनीतिक चाल है? इस फेरबदल ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब आने वाले चुनावों में मिलेगा।
🕵️♂️ पुनर्गठन या सत्ता संतुलन का नया दांव?
विधानसभा द्वारा जारी सूची में वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए विभिन्न समितियों के सभापतियों के नाम घोषित किए गए हैं। इन समितियों का कार्य प्रशासनिक और विधायी कार्यों की निगरानी करना है, लेकिन क्या यह केवल प्रशासन तक सीमित रहेगा? सूची में नियम समिति, लोक लेखा समिति, सरकारी उपक्रम समिति, महिला एवं बाल विकास समिति जैसी महत्वपूर्ण समितियां शामिल हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह पुनर्गठन क्यों किया गया और इससे कौन-कौन प्रभावित हुआ? भाजपा ने इस प्रक्रिया में सबसे अधिक पद हासिल कर लिए हैं, जबकि जदयू को अपेक्षाकृत कम पद मिले। क्या यह एनडीए के भीतर बदलते समीकरणों का संकेत है?
📌 समितियों में किसे क्या मिला – कौन सत्ता के करीब, कौन दूर?
अगर संख्याओं पर गौर करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि समितियों का पुनर्गठन केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि पूरी तरह से राजनीतिक भी है। आइए नज़र डालते हैं किसे क्या मिला:
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भाजपा – 8 सभापति
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राजद – 6 सभापति
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जदयू – 5 सभापति
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कांग्रेस – 2 सभापति
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सीपीआई (एमएल) – 1 सभापति
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सीपीआई – 1 सभापति
भाजपा ने सबसे अधिक पद हथिया लिए, जबकि जदयू को अपेक्षाकृत कम पद देकर क्या कोई बड़ा संकेत दिया गया है? जदयू के कमजोर पड़ने की अटकलें पहले से लगाई जा रही थीं, और इस पुनर्गठन ने इस संभावना को और हवा दे दी है।
🔥 क्या यह भाजपा का मास्टरस्ट्रोक है?
समितियों में प्रमुख पदों पर भाजपा और राजद के नेताओं का कब्जा है। क्या यह महज संयोग है, या इसके पीछे सत्ता संतुलन की कोई खास रणनीति छिपी हुई है? उदाहरण के लिए:
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लोक लेखा समिति – राजद के भाई वीरेंद्र
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प्राक्कलन समिति – भाजपा के तारकिशोर प्रसाद
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सरकारी उपक्रम समिति – जदयू के हरिनारायण सिंह
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महिला एवं बाल विकास समिति – भाजपा की गायत्री देवी
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गैर सरकारी विधेयक एवं संकल्प समिति – राजद के तेज प्रताप यादव
स्पष्ट है कि भाजपा और राजद ने अपने-अपने मोर्चे मजबूत कर लिए हैं, लेकिन जदयू की स्थिति कमजोर दिखाई दे रही है। क्या जदयू धीरे-धीरे बैकफुट पर जा रहा है, और भाजपा-राजद की लड़ाई ही असली मुकाबला होने वाला है?
🤯 आगे क्या होगा – चुनावी गणित में क्या बदलाव आने वाला है?
इस पुनर्गठन के राजनीतिक मायने गहरे हैं।
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क्या यह भाजपा का शक्ति प्रदर्शन है?
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क्या जदयू को संकेत दे दिया गया है कि उसकी स्थिति अब पहले जैसी मजबूत नहीं रही?
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क्या यह राजद के लिए आगे बढ़ने का सुनहरा मौका है?
बिहार की राजनीति में यह बदलाव महज एक शुरुआत है। असली खेल विधानसभा चुनावों में देखने को मिलेगा! अब देखना दिलचस्प होगा कि इस सत्ता संतुलन के खेल में कौन आगे बढ़ेगा और कौन पिछड़ जाएगा। क्या यह पुनर्गठन एक नई राजनीतिक चाल है, या इसके पीछे कोई और बड़ा खेल छिपा है?